मै पिछले दिनों एक अजीब वाकये से रुबरु हुआ। मै जहाँ रहता हूँ वहां कुछ मुस्लिम विद्यार्थी भी रहते है जो कि अफगानिस्तान के निवासी है। मेरे साथ मेरे परम मित्र सुमित जी भी रहते हैं । उनको विभिन्न धर्मग्रंथो को पढने और जानने का शौक हैं और इसी शौक के चलते उन्होंने "कुरआन " खरीदी पुस्तक मेले से ।
वो इसके द्वारा इस्लाम को जानने की इच्छा रखते थे । उन्होंने इसका अध्ययन शुरू ही किया था कि एक दिन उन मुस्लिम विद्यार्थियों में से एक हमारे आया और pucha कि आप क्या "कुरआन" का अध्ययन कर रहे है।
हम क्या जवाब देते , कहा क़ि हाँ भाई हम तो उसको पड़ रहे है।
उसने कहा क़ि क्या वो उसको देख सकता है। मैंने उसे पुस्तक सुपुर्द कर दी। अब मुझे क्या पता था कि उसके दिमाग में क्या है और वो क्या सोच कर यहाँ आया है।
उसने "कुरआन" को हाथ में लिया, चूमा, सर से लगाया।
तत्पश्चात जो बात चीत हुई वो मेरे लिए काफी आश्चर्यजनक थी। उसने पहले तो पूछा कि आप ने इसको कहा से प्राप्त किया। जब हमने बताया कि इसको खरीद कर लाये है। तो उसने कहा कि आप इसको अपने पास नही रख सकते है। ये काफी अनोखी बात थी मेरे लिए। आख़िर कोई इस पवित्र पुस्तक को अपने पास क्यो नही रख सकता। उसने बताया कि आप इसको रखने के काबिल नही है। इसको पढने के लिए कुछ खास तौर तरीके होते है कुछ नियम कानून है। आप उनका पालन नही कर सकते है। इसलिए आप इसको अपने पास रखने के काबिल नही है। अब मुझे ये समझ नही आया आख़िर मैं क्यो इसको अपने पास रखने और पढने के काबिल नही हूँ ।
कोई उचित कारण तो हो इसका। लेकिन उसका कोई तर्क मेरे समझ में नही आ रहा था।
उसने कहा कि आपको जब भी किसी इस्लाम सम्बन्धी जानकारी कि जरुरत हो मेरे पास चले आना मैं आप कि समस्या को सुलझा दूंगा।
इतना कह कर उसने पुस्तक का मूल्य हमे पकडाया और "कुरआन" को लेकर वहां से चला गया । मैं कुछ कर भी नही सका। आख़िर हम एक लोकतान्त्रिक देश में रहते है। हम कुछ भी पढने और समझने का अधिकार रखते है। अब मैं इस बात को कहाँ तक तर्कसंगत समझूँ कि कोई इस आधार पर किसी को क्यो कोई पुस्तक पढने से रोकेगा और फ़िर वो तो मात्र एक हिन्दी अनुवाद है।
ये किस तरह कि बात हुई कि आप इसको पढने के काबिल नही है। मैं एक विद्यार्थी हूँ और पुस्तक मेरा जीवन है। अब अगर मैं किसी धर्म को जानना और समझना चाहता हूँ तो फ़िर उसके धार्मिक ग्रंथो का अध्ययन करूँगा ही। फ़िर ये बात कहाँ से आ गई। किस आधार पर मैं नाकाबिल हो गया?
गुरुवार, 10 दिसंबर 2009
क्या ये उचित है क़ि किसी से इस आधार पर धार्मिक पुस्तक छीन लो कि वो दूसरे धर्म का है और पढने के काबिल नही है.
प्रस्तुतकर्ता
gaurav vidrohi
पर
11:39 pm
रविवार, 22 नवंबर 2009
बादल और नेता
प्रस्तुतकर्ता
gaurav vidrohi
पर
11:48 pm
बरसते बादल,
गरजते बादल,
एक दूसरे को लतियाते बादल
धकियाते बादल।
ऐसा लगता है
इस बारिश के मौसम में
ऊपर आसमान में
नीचे की राजनीति की आत्मा आ गई हो ।
यहाँ संसद में
हमारे नेता गरजते है
प्रेस कांफ्रेंस में बरसते है।
बस एक अन्तर है
बादल और नेता में।
बादल हमे देते है खूब ढेर सारा पानी
और नेता हमसे लेते है वोट
और सिर्फ़ देते है
टूटी फूटी सड़के और चोट।
ये बादल की तरह थुलथुल हो जाते है
पर कभी फटते नही है
बस हम सर पटकते रहते है।
गरजते बादल,
एक दूसरे को लतियाते बादल
धकियाते बादल।
ऐसा लगता है
इस बारिश के मौसम में
ऊपर आसमान में
नीचे की राजनीति की आत्मा आ गई हो ।
यहाँ संसद में
हमारे नेता गरजते है
प्रेस कांफ्रेंस में बरसते है।
बस एक अन्तर है
बादल और नेता में।
बादल हमे देते है खूब ढेर सारा पानी
और नेता हमसे लेते है वोट
और सिर्फ़ देते है
टूटी फूटी सड़के और चोट।
ये बादल की तरह थुलथुल हो जाते है
पर कभी फटते नही है
बस हम सर पटकते रहते है।
मेरी जिन्दगी में कुछ लोगो ने नई पहल कर दी है.
प्रस्तुतकर्ता
gaurav vidrohi
पर
11:21 pm
इस समय में एक अजीब सी परिस्थिति से गुजर रहा हूँ । कुछ लोगो ने मुझे एक तरीके की अलग उर्जा से परिचित कराया है। ये उर्जा निश्चित रूप से कई परिवर्तनों के लिए जिम्मेदार साबित होने जा रही है।
मै पिछले दिनों कॉलेज में अपने मित्रो के साथ बैठा था। चर्चा इस बात पर हो रही थी कि आख़िर हिन्दुस्तानी समाज के अनुसार विवाह करके फिर परिस्थितियों से जूझना चाहिए या फ़िर व्यक्ति को पहले प्रेम तत्पश्चात विवाह कि ओर कदम बढ़ाने चाहिए।
अब इस पर हर एक की राय एक जैसी तो होने से रही.... सो एक बहस ने जन्म लिया कि आख़िर उचित कौन सी है। वैसे ये बातेकाफी लम्बी जा सकती थी परन्तु फोटोग्राफी के सर के आतंक के चलते मात्र २०- २५ मिनट में ही समाप्त हो गई। परन्तु उसके बाद जब मैंने सबकी बातो पर विचार किया तो लगा कि कितनी अजीब सोच से भी परिचय होगा। अजीब इस बात को लेकर कि लडकिया एक तरफ़ तो ख़ुद को अतिआधुनिक बताती फिरती है पर जब बात ख़ुद कि जिंदगी आए तो फ़िर पुरुषो कि बाहों टेल ही जिंदगी गुजार देना पसंद करेंगी। आख़िर वो ख़ुद को हमेशा इतना पिछड़ा क्यो समझती है।
मै पिछले दिनों कॉलेज में अपने मित्रो के साथ बैठा था। चर्चा इस बात पर हो रही थी कि आख़िर हिन्दुस्तानी समाज के अनुसार विवाह करके फिर परिस्थितियों से जूझना चाहिए या फ़िर व्यक्ति को पहले प्रेम तत्पश्चात विवाह कि ओर कदम बढ़ाने चाहिए।
अब इस पर हर एक की राय एक जैसी तो होने से रही.... सो एक बहस ने जन्म लिया कि आख़िर उचित कौन सी है। वैसे ये बातेकाफी लम्बी जा सकती थी परन्तु फोटोग्राफी के सर के आतंक के चलते मात्र २०- २५ मिनट में ही समाप्त हो गई। परन्तु उसके बाद जब मैंने सबकी बातो पर विचार किया तो लगा कि कितनी अजीब सोच से भी परिचय होगा। अजीब इस बात को लेकर कि लडकिया एक तरफ़ तो ख़ुद को अतिआधुनिक बताती फिरती है पर जब बात ख़ुद कि जिंदगी आए तो फ़िर पुरुषो कि बाहों टेल ही जिंदगी गुजार देना पसंद करेंगी। आख़िर वो ख़ुद को हमेशा इतना पिछड़ा क्यो समझती है।
बुधवार, 10 सितंबर 2008
hindi ka picharapan kuch logo ki nazar me
प्रस्तुतकर्ता
gaurav vidrohi
पर
3:53 am
mere saath ke kuch logo ka kahana hai ki hindi ek pichari language hai vastavikta me wo itna nahi samjhte ki bharat ke andar agar aap ko apni baat logo tak pahuchani hai to hindi ka madhayam hi kaam ayega.lekin aane wali peedi ko hum angrej parast banane par kyo tule hai yeh mujhe samajh nahi aata.logo aab hindi se baaghne lage hai.english ko sarwesrva maanne lage hai,
hindi ko jinda rakhne ki koshis me hamara saath de
"jai hind jai bharat"
hindi ko jinda rakhne ki koshis me hamara saath de
"jai hind jai bharat"
बुधवार, 2 अप्रैल 2008
प्रस्तुतकर्ता
gaurav vidrohi
पर
7:28 pm
aap ki soach kya darshati hai. yeh patrkarita me kaafi mahatva rakhta hai.
रविवार, 16 मार्च 2008
hindi patrkaarita
प्रस्तुतकर्ता
gaurav vidrohi
पर
7:46 pm
hindi patrkaarita ke naye aayamo ko dekh harsh hota hai. aaj sabhi hindi ke badhte rutabe ko dekh saalam kar rahe hai.hindi ki koi durdasha nahi hai. aakhir karodo logo dwara boli jaine wali bhasha bechari ho sakti hai.kabhi nahi.
so hindi ke prbhutva ko swekaare.
ji
so hindi ke prbhutva ko swekaare.
ji
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